# AP 10TH Class Hindi manushyatha ( मनुष्यता)  – डायरी का एक पन्ना (dayari ek panna) Text Book Solutions

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- Published: 2024-08-16T07:30:50+05:30
- Author: Venkat

# AP 10TH Class Hindi manushyatha ( मनुष्यता) – डायरी का एक पन्ना (dayari ek panna) Text Book Solutions

 

**पाठ्यपुस्तक के प्रश्न-अभ्यास**

**(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-**
 प्रश्न 1. कवि ने कैसी मृत्यु को सुमृत्यु
कहा है? उत्तर- जिस मनुष्य में अपने और अपनों के हित-चिंतन से पहले और सर्वोपरि दूसरों
का हित चिंतन होता है और उसमें वे गुण हों, जिनके कारण कोई मनुष्य मृत्युलोक से गमन
कर जाने के बावजूद युगों तक दुनिया की यादों में बना रहे, | ऐसे मनुष्य की मृत्यु को
ही कवि ने सुमृत्यु कहा है।

 

प्रश्न 2.
 उदार व्यक्ति की पहचान कैसे हो सकती है? उत्तर- उदार व्यक्ति की पहचान यह
है कि वह इस असीम संसार में आत्मीयता का भाव भरता है। सभी प्राणियों के साथ अपनेपन 
का व्यवहार करता है, नित्य परोपकार के कार्य करता है, जिसके हृदय में दूसरों के प्रति
सहानुभूति और करुणा का भाव होता है। उदार व्यक्ति दूसरों की सहायता के लिए अपने तन,
मन और धन को किसी भी क्षण त्याग सकता है, जो दूसरों की प्राणरक्षा के लिए अपना सर्वस्व
न्योछावर करने को तत्पर रहता है। वह जाति, देश, रंग-रूप आदि का भेद किए बिना सभी को
अपना मानता है। वह स्वयं हानि उठाकर भी दूसरों का हित करता है। प्रेम, भाईचारा और उदारता
ही उसकी पहचान है।

प्रश्न 3.
 कवि ने दधीचि, कर्ण आदि महान व्यक्तियों का उदाहरण देकर ‘मनुष्यता’ के लिए
क्या संदेश दिया है? उत्तर- कवि ने दधीचि, कर्ण आदि महान व्यक्तियों का उदाहरण देकर
मनुष्यता के लिए यह संदेश दिया है कि प्रत्येक मनुष्य को परोपकार करते हुए अपना सर्वस्व
त्यागने से कभी पीछे नहीं हटना चाहिए। इन व्यक्तियों ने दूसरों की भलाई हेतु अपना सर्वस्व
दान कर दिया था। दधीचि ने अपनी अस्थियों का तथा कर्ण ने कुंडल और कवच का दान कर दिया
था। हमारा शरीर नश्वर है इसलिए इससे मोह को त्याग कर दूसरों के हित-चिंतन में लगा देने
में ही इसकी सार्थकता है। यही कवि ने संदेश दिया है।

प्रश्न 4.
 कवि ने किन पंक्तियों में यह व्यक्त किया है कि हमें गर्व-रहित जीवन व्यतीत
करना चाहिए? उत्तर- कवि ने दधीचि, कर्ण आदि महान व्यक्तियों का उदाहरण देकर सारी मनुष्यता
को त्याग और बलिदान का संदेश दिया है। अपने लिए तो सभी जीते हैं पर जो परोपकार के लिए
जीता और मरता है उसका जीवन धन्य हो जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार दधीचि ऋषि ने 
वृत्रासुर से देवताओं की रक्षा करने के लिए अपनी अस्थियों तक का दान कर दिया। इसी प्रकार
कर्ण ने अपने जीवन-रक्षक, कवच-कुंडल को अपने शरीर से अलग करके दान में दिया था। रंतिदेव
नामक दानी राजा ने भूख से व्याकुल ब्राह्मण को अपने हिस्से का भोजन दे दिया था। राजा
शिवि ने कबूतर के प्राणों की रक्षा हेतु अपने शरीर का मांस काटकर दे दिया। ये कथाएँ
हमें परोपकार का संदेश देती हैं। ऐसे महान लोगों के त्याग के कारण ही मनुष्य जाति का
कल्याण संभव हो सकता है। कवि के अनुसार मनुष्य को इस नश्वर शरीर के लिए मोह का त्याग
कर देना चाहिए। उसे केवल परोपकार करना चाहिए। वास्तव में सच्चा मनुष्य वही होता है,
जो दूसरे मनुष्य के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दे।

प्रश्न 5.
 ‘मनुष्य मात्र बंधु है’ से आप क्या समझते हैं? स्पष्ट कीजिए। उत्तर- इस 
कथन का अर्थ है कि संसार के सभी मनुष्य आपस में भाई-भाई हैं इसलिए हमें किसी से भी 
भेद-भाव नहीं करना | चाहिए। सभी एक ईश्वर की ही संतान हैं। अगर कुछ भेद दिखाई देते 
भी हैं, तो वे सभी बाहरी भेद हैं और वे भी अपने-अपने कर्मों के अनुसार दिखाई पड़ते 
हैं। मनुष्य मात्र बंधु हैं इसलिए ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का नारा बुलंद किया जाता है।
प्रत्येक मनुष्य को हर निर्बल मनुष्य की पीड़ा दूर करने का प्रयास करना चाहिए। सभी 
आपस में भाई-चारे की भावना से रहें तथा सभी में प्रेम एवं एकता का संचार हो।

प्रश्न 6.
 कवि ने सबको एक होकर चलने की प्रेरणा क्यों दी है? उत्तर- कवि ने सबको एक
होकर चलने की प्रेरणा इसलिए दी है क्योंकि इससे आपसी मेल-भाव बढ़ता है तथा हमारे सभी
काम सफल हो जाते हैं। यदि हम सभी एक होकर चलेंगे तो जीवन मार्ग में आने वाली हर विघ्न-
बाधा पर विजय पा लेंगे। जब सबके द्वारा एक साथ प्रयास किया जाता है तो वह सार्थक सिद्ध
होता है। सबके हित में ही हर एक का हित निहित होता है। आपस में एक-दूसरे का सहारा बनकर
आगे बढ़ने से प्रेम व सहानुभूति के संबंध बनते हैं तथा परस्पर शत्रुता एवं भिन्नता 
दूर होती है। इससे मनुष्यता को बल मिलता है। कवि के अनुसार यदि हम एक-दूसरे का साथ 
देंगे तो, हम प्रगति के पथ पर अग्रसर हो सकेंगे।

प्रश्न 7.
 व्यक्ति को किस प्रकार का जीवन व्यतीत करना चाहिए? इस कविता के आधार पर 
लिखिए। उत्तर- व्यक्ति को सदा दूसरों की भलाई करते हुए, मनुष्य मात्र को बंधु मानते
हुए तथा दूसरों के हित-चिंतन के लिए अपना सर्वस्व त्यागकर अपना जीवन व्यतीत करना चाहिए।
इसके अतिरिक्त उसे अपने अभीष्ट मार्ग की ओर निरंतर सहर्ष बढ़ते रहना चाहिए।

प्रश्न 8.
 ‘मनुष्यता’ कविता के माध्यम से कवि क्या संदेश देना चाहता है? उत्तर- मानव
जीवन एक विशिष्ट जीवन है क्योंकि मनुष्य के मन में प्रेम, त्याग, बलिदान, परोपकार का
भाव होता है। अपने से पहले दूसरों की चिंता करते हुए अपनी शक्ति, अपनी बुधि और अपनी
वैचारिक शक्ति का सदुपयोग करना मानव का कर्तव्य है। प्रस्तुत कविता के माध्यम से कवि
मानवीय एकता, सहानुभूति, सद्भाव, उदारता और करुणा का संदेश देना चाहता है। वह चाहता
है कि मनुष्य समस्त संसार में अपनत्व की अनुभूति करे। वह दीन-दुखियों, जरूरतमंदों के
लिए बड़े से बड़ा त्याग करने के लिए तैयार रहे। वह पौराणिक कथाओं के माध्यम से विभिन्न
महापुरुषों जैसे दधीचि, कर्ण, रंतिदेव के अतुलनीय त्याग से प्रेरणा ले। ऐसे सत्कर्म
करे जिससे मृत्यु उपरांत भी लोग उसे याद करें। उसका यश रूपी शरीर सदैव जीवित रहे। निःस्वार्थ
भाव से जीवन जीना, दूसरों के काम आना व स्वयं ऊँचा उठने के साथ-साथ दूसरों को भी ऊँचा
उठाना ही मनुष्यता’ का वास्तविक अर्थ है।

**(ख) निम्नलिखित पंक्तियों का भाव स्पष्ट कीजिए-**
 प्रश्न 1. सहानुभूति चाहिए, महाविभूति
है यही; वशीकृता सदैव है बनी हुई स्वयं मही। विरुद्धवाद बुद्ध का दया-प्रवाह में बहा,
विनीत लोकवर्ग क्या न सामने झुका रहा? उत्तर- इन पंक्तियों का भाव है कि प्रत्येक मनुष्य
को प्रत्येक मनुष्य के जीवन में समय-असमय आने वाले हर दुख-दर्द में सहानुभूति होनी 
चाहिए, क्योंकि एक-दूसरे के दुख-दर्द का बोझ सहानुभूति की प्रवृत्ति होने से कम हो 
जाता है। वास्तव में सहानुभूति दर्शाने का गुण महान पूँजी है। पृथ्वी भी सदा से अपनी
सहानुभूति तथा दया के कारण वशीकृता । बनी हुई है। भगवान बुद्ध ने भी करुणावश उस समय
की पारंपरिक मान्यताओं का विरोध किया। विनम्र होकर ही किसी को झुकाया जा सकता है। उदाहरणार्थ-
फलदार पेड़ तथा संत-महात्मा हमेशा अपनी विनम्रता से ही मनुष्य जाति का उपकार करते हैं।

प्रश्न 2.
 रहो न भूल के कभी मदांध तुच्छ वित्त में, सनाथ जान आपको करो न गर्व चित्त
में। अनाथ कौन है यहाँ? त्रिलोकनाथ साथ हैं, दयालु दीनबंधु के बड़े विशाल हाथ हैं। 
उत्तर कवि के अनुसार समृद्धशाली होने पर भी कभी अहंकार नहीं करना चाहिए। यहाँ कोई भी
अनाथ नहीं है क्योंकि ईश्वर ही परमपिता है। धन और परिजनों से घिरा हुआ मनुष्य स्वयं
को सनाथ अनुभव करता है। इसका परिणाम यह होता है कि वह स्वयं को सुरक्षित समझने लगता
है। इस कारण वह अभिमानी हो जाता है। कवि कहता है कि सच्चा मनुष्य वही है जो संपूर्ण
मानव जाति के कल्याण के लिए मरता और जीता है। वह आवश्यकता पड़ने पर दूसरों के लिए अपना
शरीर भी बलिदान कर देता है। भगवान सारी सृष्टि के नाथ हैं, संरक्षक हैं, उनकी शक्ति
अपरंपार है। वे अपने अपार साधनों से सबकी रक्षा और पालन करने में समर्थ हैं। वह प्राणी
भाग्यहीन है जो मन में अधीर, अशांत, असंतुष्ट और अतृप्त रहता है और अधिक पाने की ललक
में मारा-मारा फिरता है। अतः व्यक्ति को समृद्धि में कभी अहंकार नहीं करना चाहिए।

प्रश्न 3.
 चलो अभीष्ट मार्ग में सहर्ष खेलते हुए, विपत्ति, विघ्न जो पड़े उन्हें ढकेलते
हुए। घटे न हेलमेल हाँ, बढ़े न भिन्नता कभी, अतर्क एक पंथ के सतर्क पंथ हों सभी। उत्तर-
इन पंक्तियों का अर्थ है कि मनुष्य को अपने निर्धारित उद्देश्य रूपी मार्ग पर प्रसन्नतापूर्वक
विघ्न-बाधाओं से जूझते हुए आगे बढ़ते रहना चाहिए। इस मार्ग पर चलते हुए परस्पर भाई-
चारे की भावना उत्पन्न करो, जिससे आपसी भेद-भाव दूर हो जाए। इसके अतिरिक्त बिना किसी
तर्क के सतर्क होकर इस मार्ग पर चलना चाहिए।

**योग्यता विस्तार**
 प्रश्न 1. अपने अध्यापक की सहायता से रंतिदेव, दधीचि, कर्ण आदि
पौराणिक पात्रों के विषय में जानकारी प्राप्त कीजिए। उत्तर- **रंतिदेव-** भारत के प्रसिद्ध
राजा थे। एक बार भीषण अकाल पड़ गया। उस अकाल से तालाब और कुएँ सूख गए। फ़सलें सूख गईं।
राजकोष में अनाज का भंडार समाप्त हो गया। दयालु राजा रतिदेव से अपनी प्रजा का दुख देखा
न गया। आखिर प्रजा के सुख-दुख को वे अपना दुख जो समझते थे। उन्होंने प्रजा को अनाज 
देना शुरू कर दिया। प्रजा की भारी भरकम संख्या के आगे अनाज कम पड़ने लगा, जो बाद में
समाप्त हो गया। राज-परिवार को भी अब अकाल के कारण आधा पेट खाकर गुजारा करना पड़ रहा
था। ऐसी स्थिति आ गई कि राजा को भी कई दिनों से भोजन न मिला था। ऐसी स्थिति में जब 
राजा को कई दिनों बाद खाने को कुछ रोटियाँ मिलीं तभी एक भूखा व्यक्ति दरवाजे पर आ गया।
राजा से उसकी भूख न देखी गई और उसे खिला दिया। ऐसी मान्यता है कि उनके कृत्य से प्रभावित
होकर ईश्वर ने उनका भंडार अन्न-धन से भर दिया।

**दधीचि-** इनकी गणना भारत के परमदानी एवं ज्ञानी ऋषियों में की जाती है। दधीचि अत्यंत
परोपकारी थे। वे तप में लीन रहते थे। उन्हीं दिनों देवराज इंद्र उनके पास आए। साधना
पूर्ण होते ही दधीचि ने इंद्र से आने का कारण पूछा। इंद्र ने बताया कि ऋषिवर! आप तो
जानते ही हैं कि देवता और दानवों में युद्ध छिड़ा हुआ है। इस युद्ध में दानव, देवों
पर भारी साबित हो रहे हैं। देवगण हारने की कगार पर हैं। यदि कुछ उपाय न किया गया तो
स्वर्गलोक के अलावा पृथ्वी पर भी दानवों का कब्जा हो जाएगा। ऋषि ने कहा, “देवराज इसमें
मैं क्या कर सकता हूँ? मैं तो लोगों की भलाई की कामना लिए हुए तप ही कर सकता हूँ।” 
इंद्र ने कहा, “मुनिवर, यदि आप अपनी हड्डियाँ दे दो तो इनसे बज्र बनाकर असुरराज वृत्तासुर
को पराजित किया जा सकेगा और देवगण युद्ध जीत सकेंगे। इंद्र की बातें सुनकर दधीचि ने
साँस ऊपर खींची जिससे उनका शरीर निर्जीव हो गया। उनकी हड्डियों से बने वज्र से असुर
मारे गए और देवताओं की विजय हुई। अपने इस अद्भुत त्याग से दधीचि का नाम अमर हो गया।

**कर्ण-** यह अत्यंत पराक्रमी, वीर और दानी राजकुमार था। वह कुंती का पुत्र और अर्जुन
का भाई था जो सूर्य के वरदान से पैदा हुआ था। सूर्य ने उसकी रक्षा हेतु जन्मजात कवच-
कुंडल प्रदान किया था जिसके कारण उसे मारना या हराना कठिन था। कर्ण इतना दानी था कि
द्वार पर आए किसी व्यक्ति को खाली हाथ नहीं लौटने देता था। महाभारत युद्ध में कर्ण 
ने दुर्योधन का साथ दिया। कर्ण को पराजित करने के लिए कृष्ण और इंद्र ने ब्राह्मण का
रूप धारण कर उससे कवच और कुंडल माँगा। कर्ण समझ गया कि यह उसे मारने के लिए रची गई 
एक चाल है फिर भी उसने कवच-कुंडल दान दे दिया
 और अपनी मृत्यु की परवाह किए बिना अपना
वचन निभाया।

प्रश्न 2.
 ‘परोपकार’ विषय पर आधारित दो कविताओं और दो दोहों का संकलन कीजिए। उन्हें
कक्षा में सुनाइए। उत्तर- ‘परोपकार’ विषय पर आधारित कविताएँ और दोहे- **कविता-** औरों
को हसते देखो मनु, हँसो और सुख पाओ। अपने सुख को विस्तृत कर लो, सबको सुखी बनाओ। छात्र
पुस्तकालय से ‘कामायनी’ लेकर कविता पढ़ें। (जयशंकर प्रसाद कृत ‘कामायनी’ से)

**दोहे-** यों रहीम सुख होत है, उपकारी के संग ।
 बाँटन वारे को लगै, ज्यो मेहदी को
रंग ।। तरुवर फल नहिं खात है, नदी न संचै नीर। परमारथ के कारनै, साधुन धरा शरीर ।।

**परियोजना कार्य**
 प्रश्न 1. अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध’ की कविता ‘कर्मवीर’ तथा
अन्य कविताओं को पढ़िए तथा कक्षा में सुनाइए। उत्तर- देखकर बाधा विविध बहु विघ्न घबराते
नहीं। रह भरोसे भाग्य के दुख भोग पछताते नहीं। काम कितना ही कठिन हो किंतु उकताते नहीं।
भीड़ में चंचल बने जो वीर दिखलाते नहीं। हो गए इक आन में उनके बुरे दिन भी भले। सब 
जगह सब काल में वे ही मिले फूले फले। आज करना है जिसे करते उसे हैं आज ही। सोचते कहते
हैं जो कुछ कर दिखाते हैं वही। हो गए इक आन में उनके बुरे दिन भी भले। सब जगह सब काल
में वे ही मिले फूले-फले ।। (‘अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध”)

प्रश्न 2.
 भवानी प्रसाद मिश्र की ‘प्राणी वही प्राणी है’ कविता पढ़िए तथा दोनों कविताओं
के भावों में व्यक्त हुई समानता को लिखिए। उत्तर- भवानी प्रसाद मिश्र की कविता ‘प्राणी
वही प्राणी है’ छात्र पुस्तकालय से या इंटरनेट से प्राप्त करें और दोनों कविताओं के
भावों की तुलना स्वयं करें।

 

# Chapter :  डायरी का एक पन्ना

**पाठ्यपुस्तक के प्रश्न-अभ्यास**

**मौखिक**

**निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक-दो पंक्तियों में दीजिए-**

प्रश्न 1.
 कलकत्ता वासियों के लिए 26 जनवरी 1931 का दिन क्यों महत्त्वपूर्ण था? उत्तर-
26 जनवरी, 1931 का दिन कलकत्तावासियों के लिए इसलिए महत्त्वपूर्ण था, क्योंकि सन् 1930
में गुलाम भारत में पहली बार स्वतंत्रता दिवस मनाया गया था। इस वर्ष उसकी पुनरावृत्ति
थी, जिसके लिए काफ़ी तैयारियाँ पहले से ही की गई थीं। इसके लिए लोगों ने अपने-अपने 
मकानों व सार्वजनिक स्थलों पर राष्ट्रीय झंडा फहराया था और उन्हें इस तरह से सजाया 
गया था कि ऐसा मालूम होता था, मानों स्वतंत्रता मिल गई हो।

 

प्रश्न 2.
 सुभाष बाबू के जुलूस का भार किस पर था? उत्तर- सुभाष बाबू के जुलूस का भार
पूर्णोदास पर था जिन्होंने इस जुलूस का पूरा प्रबंध किया था उन्होंने जगह-जगह फोटो 
का | भी प्रबंध किया था और बाद में पुलिस द्वारा उन्हें पकड़ लिया गया था।

प्रश्न 3.
 विद्यार्थी संघ के मंत्री अविनाश बाबू के झंडा गाड़ने पर क्या प्रतिक्रिया
हुई? उत्तर- विद्यार्थी संघ के मंत्री अविनाश बाबू के झंडा गाड़ने पर पुलिस ने उन्हें
पकड़ लिया तथा अन्य लोगों को मारा और वहाँ से हटा दिया।

प्रश्न 4.
 लोग अपने-अपने मकानों व सार्वजनिक स्थलों पर राष्ट्रीय झंडा फहराकर किस 
बात का संकेत देना चाहते थे? उत्तर- लोग अपने-अपने मकानों व सार्वजनिक स्थलों पर झंडा
फहराकर इस बात का संकेत देना चाहते थे कि वे भी अपने देश । की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय
झंडे का पूर्ण सम्मान करते हैं।

प्रश्न 5.
 पुलिस ने बड़े-बड़े पार्को तथा मैदानों को क्यों घेर लिया था? उत्तर- पुलिस
ने बड़े-बड़े पार्को तथा मैदानों को इसलिए घेर लिया था ताकि लोग वहाँ एकत्रित न हो 
सकें। पुलिस नहीं। चाहती थी कि लोग एकत्र होकर पार्को तथा मैदानों में सभा करें तथा
राष्ट्रीय ध्वज फहराएँ। पुलिस पूरी ताकत से गश्त लगा रही थी। प्रत्येक मोड़ पर गोरखे
तथा सार्जेंट मोटर-गाड़ियों में तैनात थे। घुड़सवार पुलिस का भी प्रबंध था।

**लिखित**

**(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (25-30 शब्दों में) लिखिए-**

प्रश्न 1.
 26 जनवरी 1931 के दिन को अमर बनाने के लिए क्या-क्या तैयारियाँ की गईं? 
उत्तर- 26 जनवरी, 1931 के दिन को अमर बनाने के लिए निम्नलिखित तैयारियाँ की गईं :

 1. कलकत्ता के लोगों ने अपने-अपने घरों को खूब सजाया।
 2. अधिकांश मकानों पर राष्ट्रीय झंडा फहराया गया।
 3. कुछ मकानों और बाज़ारों को ऐसे सजाया गया कि मानो स्वतंत्रता ही प्राप्त हो गई हो।
 4. कलकत्ते के प्रत्येक भाग में झंडे लहराए गए।
 5. लोगों ने ऐसी सजावटे पहले नहीं देखी थी।

प्रश्न 2.
 ‘आज जो बात थी वह निराली थी’-किस बात से पता चल रहा था कि आज का दिन अपने
आप में निराला है? स्पष्ट कीजिए। उत्तर- 26 जनवरी का दिन अपने-आप में निराला था। कलकत्तावासी
पूरे उत्साह पूरी नवीनता के साथ इस दिन को यादगार दिन बनाने की तैयारी में जुटे थे।
अंग्रेज़ी सरकार के कड़े सुरक्षा प्रबंधों के बाद भी हज़ारों की संख्या में लोग लाठी
खाकर भी जुलूस में भाग ले रहे थे। सरकार द्वारा सभा भंग करने की कोशिशों के बावजूद 
भी बड़ी संख्या में आम जनता और कार्यकर्ता संगठित होकर मोनुमेंट के पास एकत्रित हो 
रहे थे। स्त्रियों ने भी इस आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लिया। इस दिन अंग्रेज़ी कानून
को खुली चुनौती देकर कलकत्तावासियों ने देश-प्रेम और एकता का अपूर्व प्रदर्शन किया।

प्रश्न 3.
 पुलिस कमिश्नर के नोटिस और कौंसिल के नोटिस में क्या अंतर था? उत्तर- दोनों
में यह अंतर था कि पुलिस कमिश्नर का नोटिस निकल चुका था कि अमुक-अमुक धारा के अनुसार
कोई सभा नहीं हो सकती और जो लोग सभा में भाग लेंगे, वे दोषी समझे जाएँगे; जबकि कौंसिल
के नोटिस में था कि मोनुमेंट के नीचे ठीक चार बजकर चौबीस मिनट पर झंडी फहराया जाएगा
तथा स्वतंत्रता की प्रतिज्ञा पढ़ी जाएगी। इसमें सर्व-साधारण की उपस्थिति होनी चाहिए।

प्रश्न 4.
 धर्मतल्ले के मोड़ पर आकर जुलूस क्यों टूट गया? उत्तर- सुभाष बाबू के नेतृत्व
में जुलूस पूरे जोश के साथ आगे बढ़ रहा था। थोड़ा आगे बढ़ने पर पुलिस ने सुभाष बाबू
को पकड़ लिया और गाड़ी में बिठाकर लाल बाज़ार के लॉकअप में भेज दिया। जुलूस में भाग
लेनेवाले आंदोलनकारियों पर पुलिस ने लाठियाँ बरसानी शुरू कर दी थीं। बहुत से लोग बुरी
तरह घायल हो चुके थे। पुलिस की बर्बरता के कारण जुलूस बिखर गया था। मोड़ पर पचास साठ
स्त्रियाँ धरना देकर बैठ गईं थीं। पुलिस ने उन्हें पकड़कर लालबाज़ार भेज दिया था।

प्रश्न 5.
 डॉ० दासगुप्ता जुलूस में घायल लोगों की देख-रेख तो कर ही रहे थे, उनके फ़ोटो
भी उतरवा रहे थे। उन लोगों के फ़ोटो खींचने की क्या वजह हो सकती थी ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- डॉ० दास गुप्ता जुलूस में घायल लोगों की देख-रेख के साथ उनके फ़ोटो भी उतरवा
रहे थे, ताकि पूरा देश अंग्रेज़ प्रशासकों के जुल्मों से अवगत होकर उनका विरोध करके
उन्हें देश से बाहर निकालने के लिए तैयार हो जाए।

**(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (50-60 शब्दों में) लिखिए-**

प्रश्न 1.
 सुभाष बाबू के जुलूस में स्त्री समाज की क्या भूमिका थी? उत्तर- सुभाष बाबू
के जुलूस में स्त्री-समाज ने एक अहम भूमिका निभायी थी। स्त्री समाज ने जगह-जगह से जुलूस
निकालने की तथा ठीक स्थान पर पहुँचने की तैयारी और कोशिश की थी। स्त्रियों ने मोनुमेंट
की सीढ़ियों पर चढ़कर झंडा फहरा करे घोषणा-पत्र पढ़ा था तथा पुलिस के बहुत-से अत्याचारों
का सामना किया था। विमल प्रतिभा, जानकी देवी और मदालसा आदि ने जुलूस का सफल नेतृत्व
किया था।

प्रश्न 2.
 जुलूस के लालबजार आने पर लोगों की क्या दशा हुई? उत्तर- जुलूस के लालबाज़ार
आने पर पुलिस ने एकत्रित भीड़ पर लाठियों से प्रहार किया। सुभाष बाबू को पकड़कर लॉकअप
में भेज दिया गया। स्त्रियों का नेतृत्व करनेवाली मदालसा भी पकड़ी गई थी। उसको थाने
में मारा भी गया । इस जुलूस में लगभग 200 व्यक्ति घायल हुए जिसमें से कुछ की हालत गंभीर
थी।

प्रश्न 3.
 जब से कानून भंग का काम शुरू हुआ है तब से आज तक इतनी बड़ी सभा ऐसे मैदान
में नहीं की गई थी और यह सभा तो कहना चाहिए कि ओपन लड़ाई थी।’ यहाँ पर कौन से और किसके
द्वारा लागू किए गए कानून को भंग करने की बात कही गई है? क्या कानून भंग करना उचित 
था? पाठ के संदर्भ में अपने विचार प्रकट कीजिए। उत्तर- जब पुलिस कमिश्नर का नोटिस निकला
कि अमुक-अमुक धारा के अनुसार कोई सभा नहीं हो सकती और सभा में भाग लेने वालों को दोषी
समझा जाएगा, तो कौंसिल की तरफ़ से भी नोटिस निकाला गया कि मोनुमेंट के नीचे ठीक चार
बजकर चौबीस मिनट पर झंडा फहराया जाएगा तथा स्वतंत्रता की प्रतिज्ञा पढ़ी जाएगी। इस 
तरह से पुलिस कमिश्नर द्वारा सभा स्थगित करने जैसे लागू कानून को कौंसिल की तरफ़ से
भंग किया गया था; जोकि उचित था, क्योंकि इसके बिना आज़ादी की आग प्रज्वलित न होती।

प्रश्न 4.
 बहुत से लोग घायल हुए, बहुतों को लॉकअप में रखा गया, बहुत-सी स्त्रियाँ 
जेल गईं, फिर भी इस दिन को अपूर्व बताया गया है। आपके विचार में यह सब अपूर्व क्यों
है? अपने शब्दों में लिखिए। उत्तर- हमारे विचार में 26 जनवरी 1931 का दिन अद्भुत था
क्योंकि इस दिन कलकतावासियों को अपनी देशभक्ति, एकता व साहस को सिद्ध करने का अवसर 
मिला था। उन्होंने देश का दूसरा स्वतंत्रता दिवस पूरे जोश और उत्साह के साथ मनाया। 
अंग्रेज़ प्रशासकों ने इसे उनका अपराध मानते हुए उनपर और विशेष रूप से महिला कार्यकर्ताओं
पर अनेक अत्याचार किए लेकिन पुलिस द्वारा किया गया क्रूरतापूर्ण व्यवहार भी उनके इरादों
को बदल नहीं सका और न ही उनके जोश कम कर पाया । एकजुट होकर राष्ट्रीय झंडा फहराने और
स्वतंत्रता की प्रतिज्ञा करने का जो संकल्प उन सबने मिलकर लिया था उसे उन्होंने यातनाएँ
सहकर भी उस दिन पूरा किया।

**(ग) निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए-**

प्रश्न 1.
 आज तो जो कुछ हुआ वह अपूर्व हुआ है। बंगाल के नाम या कलकत्ता के नाम पर 
कलंक था कि यहाँ काम नहीं हो रहा है वह आज बहुत अंश में धुल गया। उत्तर- इसका आशय है
कि स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए इतना बड़ा आंदोलन बंगाल या कलकत्ता में नहीं हुआ था।
यहाँ के विषय में लोगों के मन में जोश नहीं था, यह बात कलकत्ता के माथे पर कलंक थी।
लेकिन इसे 26 जनवरी, 1931 को हुई स्वतंत्रता संग्राम की पुनरावृत्ति ने धो दिया। इस
संग्राम में लोगों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया था और लोग जेल भी गए। लोगों के अंदर देशभक्ति
की भावना का संचार हो चुका था।

प्रश्न 2.
 खुला चैलेंज देकर ऐसी सभा पहले नहीं की गई थी। उत्तर- प्रस्तुत पंक्ति का
यह आशय है कि जब 26 जनवरी सन् 1931 के दिन कलकत्ता में स्थान-स्थान पर झंडोत्सव मनाए
गए तो ब्रिटिश सरकार को यह बात मान्य नहीं थी इसलिए उन्होंने भारतीयों पर अनेक जुल्म
किए। कलकत्ता के इतिहास में यह पहली बार हुआ था कि पुलिस कमिश्नर दूद्वारा निकाले गए
नोटिस के बावजूद भी कौंसिल द्वारा उन्हें खुली चुनौती दी गई कि न केवल एकजुट होकर झंडा
फहराया जाएगा अपितु स्वतंत्रता की प्रतिज्ञा भी पढ़ी जाएगी। पुलिस द्वारा यह नोटिस 
भी जारी किया गया कि इन सभाओं में भाग लेनेवालों को दोषी समझा जाएगा तब भी बड़ी संख्या
में न केवल पुरुषों ने बल्कि स्त्रियों ने भी जुलूस में भाग लिया और सरकार द्वारा बनाए
गए कानून को भी भंग किया। आजादी के इतिहास में ऐसी खुली चुनौतियाँ देकर पहले कभी कोई
सभा आयोजित नहीं हुई थी।

**भाषा अध्ययन**

प्रश्न 1.
 रचना की दृष्टि से वाक्य तीन प्रकार के होते हैं- **सरल वाक्य –** सरल वाक्य
में कर्ता, कर्म, पूरक, क्रिया और क्रिया विशेषण घटकों या इनमें से कुछ घटकों का योग
होता है। स्वतंत्र रूप से प्रयुक्त होने वाला उपवाक्य ही सरल वाक्य है। उदाहरण- लोग
टोलियाँ बनाकर मैदान में घूमने लगे।

**संयुक्त वाक्य –** जिस वाक्य में दो या दो से अधिक स्वतंत्र या मुख्य उपवाक्य समानाधिकरण
योजक से जुड़े हों, वह संयुक्त वाक्य कहलाता है। योजक शब्द-और, परंतु, इसलिए आदि।
 
उदाहरण- मोनुमेंट के नीचे झंडा फहराया जाएगा और स्वतंत्रता की प्रतिज्ञा पढ़ी जाएगी।

**मिश्र वाक्य –** वह वाक्य जिसमें एक प्रधान उपवाक्य हो और एक या अधिक आश्रित उपवाक्य
हों, मिश्र वाक्य कहलाता है।
 उदाहरण- जब अविनाश बाबू ने झंडा गाड़ा तब पुलिस ने उनको
पकड़ लिया।

निम्नलिखित वाक्यों को सरल वाक्यों में बदलिए-
 I. (क) दो सौ आदमियों का जुलूस लाल 
बाजार गया और वहाँ पर गिरफ्तार हो गया। (ख) मैदान में हजारों आदमियों की भीड़ होने 
लगी और लोग टोलियाँ बना-बनाकर मैदान में घूमने लगे। (ग) सुभाष बाबू को पकड़ लिया गया
और गाड़ी में बैठाकर लाल बाजार लॉकअप में भेज दिया गया। II. बड़े भाई साहब’ पाठ में
से भी दो-दो सरल, संयुक्त और मिश्र वाक्य छाँटकर लिखिए। उत्तर- I. (क) दो सौ आदमियों
का जुलूस लाल बाज़ार जाकर गिरफ्तार हो गया। (ख) मैदान में हजारों आदमियों की भीड़ टोलियाँ
बना-बनाकर घूमने लगी। (ग) सुभाष बाबू को पकड़ कर गाड़ी में बिठाकर लालबाज़ार लॉकअप 
में भेज दिया गया।

II. सरल वाक्य- (क) वह स्वभाव से बड़े अध्ययनशील थे।
 (ख) उनकी रचनाओं को समझना मेरे
लिए छोटा मुँह बड़ी बात थी।

संयुक्त वाक्य- (क) मैं पास हो गया और दरजे में प्रथम आया।
 (ख) भाई साहब ने मानो तलवार
खींच ली और मुझ पर टूट पड़े।

मिश्र वाक्य- (क) मेरी शालीनता इसी में थी कि उनके हुक्म को कानून समझें।
 (ख) मैं 
इरादा करता कि आगे से खूब जी लगाकर पढ़ेगा।

प्रश्न 2.
 निम्नलिखित वाक्य संरचनाओं को ध्यान से पढ़िए और समझिए कि जाना, रहना और
चुकना क्रियाओं का प्रयोग किस प्रकार किया गया है। (क) 1. कई मकान सजाए गए थे। 2. कलकत्ते
के प्रत्येक भाग में झंडे लगाए गए थे। (ख) 1. बड़े बाज़ार के प्रायः मकानों पर राष्ट्रीय
झंडा फहरा रहा था। 2. कितनी ही लारियाँ शहर में घुमाई जा रही थीं। 3. पुलिस भी अपनी
पूरी ताकत से शहर में गश्त देकर प्रदर्शन कर रही थीं। (ग) 1. सुभाष बाबू के जुलूस का
भार पूर्णोदास पर था, वह प्रबंध कर चुका था। 2. पुलिस कमिश्नर का नोटिस निकल चुका था।
उत्तर- उपरिलिखित वाक्यों को पढ़ने और समझने से पता चलता है कि इनमें ‘जाना’, ‘रहना’
और ‘चुकना’ क्रियाओं का प्रयोग मुख्य क्रिया के रूप में न करके रंजक क्रिया के रूप 
में किया गया है। इससे इनकी मुख्य क्रियाएँ संयुक्त क्रिया बन गई हैं।

प्रश्न 3.
 नीचे दिए गए शब्दों की संरचना पर ध्यान दीजिए- विद्या + अर्थी – विद्यार्थी‘
विद्या’ शब्द का अंतिम स्वर ‘आ’ और दूसरे शब्द ‘अर्थी’ की प्रथम स्वर ध्वनि ‘अ’ जब 
मिलते हैं तो वे मिलकर दीर्घ स्वर ‘आ’ में बदल जाते हैं। यह स्वर संधि है जो संधि का
ही एक प्रकार है।

संधि शब्द का अर्थ है- जोड़ना। जब दो शब्द पास-पास आते हैं तो पहले शब्द की अंतिम ध्वनि
बाद में आने वाले शब्द की पहली ध्वनि से मिलकर उसे प्रभावित करती है। ध्वनि परिवर्तन
की इस प्रक्रिया को संधि कहते हैं। संधि तीन प्रकार की होती है-स्वर संधि, व्यंजन संधि,
विसर्ग संधि। जब संधि युक्त पदों को अलग-अलग किया जाता है तो उसे संधि विच्छेद कहते
हैं;
 जैसे- विद्यालय – विद्या + आलय नीचे दिए गए शब्दों की संधि कीजिए-

 1. श्रद्धा + आनंद = ….
 2. प्रति + एक = …….
 3. पुरुष + उत्तम = ………
 4. झंडा + उत्सव = ……..
 5. पुनः + आवृत्ति = ………
 6. ज्योतिः + मय = …….

उत्तर

 1. श्रद्धा + आनंद = श्रद्धानंद
 2. प्रति + एक = प्रत्येक
 3. पुरुष + उत्तम = पुरुषोत्तम
 4. झंडा + उत्सव = झंडोत्सव
 5. पुनः + आवृत्ति = पुनरावृत्ति
 6. ज्योतिः + मय = ज्योतिर्मय

**योग्यता विस्तार**

प्रश्न 1.
 भौतिक रूप से दबे हुए होने पर भी अंग्रेजों के समय में ही हमारा मन आजाद
हो चुका था। अत: दिसंबर सन् 1929 में लाहौर में कांग्रेस का एक बड़ा अधिवेशन हुआ, इसके
सभापति जवाहरलाल नेहरू जी थे। इस अधिवेशन में यह प्रस्ताव पास किया गया कि अब हम ‘पूर्ण
स्वराज्य से कुछ भी कम स्वीकार नहीं करेंगे। 26 जनवरी 1930 को देशवासियों ने पूर्ण 
स्वतंत्रता के लिए हर प्रकार के बलिदान । की प्रतिज्ञा की। उसके बाद आज़ादी प्राप्त
होने तक प्रतिवर्ष 26 जनवरी को स्वाधीनता दिवस के रूप में मनाया जाता रहा। आजादी मिलने
के बाद 26 जनवरी गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाने लगा। उत्तर- यह छात्रों की जानकारी
के लिए है।

प्रश्न 2.
 डायरी-यह गद्य की एक विधा है। इसमें दैनिक जीवन में होने वाली घटनाओं, अनुभवों
को वर्णित किया जाता है। आप भी अपनी दैनिक जीवन से संबंधित घटनाओं को डायरी में लिखने
का अभ्यास करें। उत्तर- 09 जनवरी, 2016 शनिवार

जनवरी महीने का पूर्वार्ध बीतने को है। लगता है इस बार दिल्ली से सरदी रूठी ही रहेगी।
सरदी का बहाना करके भी बिस्तर में देर तक नहीं पड़ा रह सकता। अरे! हाँ, याद आया आज 
तो हमें माता-पिता के साथ चिड़ियाघर देखने जाना है। उठकर जल्दी तैयार होता हूँ। अरे!
यह क्या पिता जी कार साफ़ करा रहे हैं। लगता है, वे कार से चिड़ियाघर जाना चाहते हैं।
लगता है कि उन्हें याद नहीं कि आज तो दिल्ली की सड़कों पर आड (विषम) नंबर की गाड़ियाँ
ही चलेंगी। हमारी कार तो इवन (सम) नंबर की है। पिता जी, उसमें समान रखवाएँ, इससे पहले
यह याद दिलाता हूँ। उनसे कहता हूँ कि या तो मेट्रो से चलें या कल रविवार को। आज तो 
इवन नंबर की कार में चलना ठीक न रहेगा, है न।

मोहित

प्रश्न 3.
 जमना लाल बजाज, महात्मा गांधी के पाँचवें पुत्र के रूप में जाने जाते हैं,
क्यों? अध्यापक से जानकारी प्राप्त करें। उत्तर- जमनालाल बजाज, बजाज उद्योग घराने के
संस्थापक थे। कभी वे राजस्थान के प्रसिद्ध व्यापारी हुआ करते थे। ये अपनी व्यावसायिक
एवं प्रशासनिक कुशलता से अंग्रेजों के प्रिय बन गए। इन्हें राय बहादुर की उपाधि देकर
अंग्रेजों ने सम्मानित किया। जमनालाल को जब गांधी जी का सान्निध्य मिला तो वे गांधी
जी से अत्यंत प्रभावित हुए और गांधी जी के शिष्य बन गए। इससे उनका स्वाभिमान जाग उठा
और उन्होंने अंग्रेजों का सम्मान लौटाया ही नहीं बल्कि गांधी जी अनुयायी भी बन गए। 
उनके द्वारा वर्धा में सेवा संघ की स्थापना की गई। वे गांधी जी के सिद्धांत सत्य और
अहिंसा का पालन करते थे। अपने सिद्धांत के प्रति ऐसा समर्पण देख गांधी जी उन्हें अपना
पुत्र मानने लगे। कालांतर में जमनालाल को गांधी जी के पाँचवें पुत्र के रूप में जाना
जाने लगा।

प्रश्न 4.
 ढाई लाख का जानकी देवी पुरस्कार जमना लाल बजाज फाउंडेशन द्वारा पूरे भारत
में सराहनीय कार्य करने वाली महिलाओं को दिया जाता है। यहाँ ऐसी कुछ महिलाओं के नाम
दिए जा रहे है- ंश्रीमती अनुताई लिमये 1993 महाराष्ट्र; सरस्वती गोरा 1996 आंध्र प्रदेश;
मीना अग्रवाल 1996 असम, सिस्टर मैथिली 1999 केरल; कुंतला कुमारी आचार्य 2001 उड़ीसा।
इनमें से किसी एक के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त कीजिए। उत्तर- छात्र स्वयं करें।

**परियोजना कार्य**

प्रश्न 1.
 स्वतंत्रता आंदोलन में निम्नलिखित महिलाओं में जो होगदान दिया, उसके बारे
में संक्षिप्त जानकारी प्राप्त करके लिखिए- (क) सरोजिनी नायडू (ख) अरुणा आसफ अली (ग)
कस्तूरबा गांधी उत्तर- छात्र स्वयं करें।

प्रश्न 2.
 इस पाठ के माध्यम से स्वतंत्रता संग्राम में कलकलाई कोलकाता ) के योगदान
का चित्र स्पष्ट होता है। आजादी के आंदोलन में आपके क्षेत्र का भी किसी न किसी प्रकार
का योगदान रहा होगा पुस्तकालय, अपने परिचितों या फिर किसी दूसरे स्त्रोत से इस संबंध
में जानकारी हासिल कर लिखिए। उत्तर- छात्र स्वयं करें।

प्रश्न 3.
 ‘केवल प्रचार में दो हजार रुपया खर्च किया गया था। तत्कालीन समय को मद्देनज़र
रखते हुए अनुमान लगाइए कि प्रचार-प्रसार के लिए किन माध्यमों का उपयोग किया गया होगा?
उत्तर- तत्कालीन समय अर्थात् 1930-31 में प्रचार-प्रसार के लिए बहुत सारे झंडे बनवाए
गए होंगे, प्रचार के पंपलेट (इश्तिहार) छपवाकर बाँटे गए होंगे, दीवारों पर नारे या 
स्लोगन लिखे गए होंगे। इसके अलावा कार्यकर्ताओं को दूर-दराज के क्षेत्रों में आने-जाने(
प्रचारार्थ) के लिए कुछ नकद भी दिया गया होगा।

प्रश्न 4.
 आपको अपने विद्यालय में लगने वाले पल्स पोलियो केंद्र की सूचना पूरे मोहल्ले
को देनी है। आप इस बात का प्रचार बिना पैसे के कैसे कर पाएँगे? उदाहरण के साथ लिखिए।
उत्तर- मैं अपनी कॉलोनी के आसपास स्थित झुग्गी बस्तियों में अपने मित्रों के साथ जाऊँगा
और पल्स पोलियो ड्राप पिलवाने का अनुरोध करूँगा तथा पोलियो के खतरे से भी सावधान करूंगा।

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